रांची: झारखंड उच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में स्पष्ट किया है कि अगर किसी आरोपी को एक ही अपराध के लिए पॉक्सो अधिनियम की धारा और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा दोनों के तहत दोषी ठहराया जाता है तो पॉक्सो एक्ट की धारा 42 अदालत को यह निर्देश देती है कि वह दोनों में से जो अधिक गंभीर (बड़ी) सजा हो केवल वही सजा दे| अदालत दोनों धाराओं के तहत अलग-अलग सजाएं सुनाकर उन्हें लगातार भुगतने का आदेश नहीं दे सकती है| यह फैसला हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस आनंदा सेन और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने सिमडेगा सिविल कोर्ट द्वारा वर्ष 2015 को दिए गए दोष-सिद्धी के फैसले और 07 जुलाई 2015 के सजा के आदेश के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई के दौरान दिया|
क्या है मामला?:
निचली अदालत ने अपीलकर्ता को आईपीसी की धारा 376(2)(f), 323, 506 और पॉक्सो एक्ट की धारा 4 के तहत दोषी ठहराया था| ट्रायल कोर्ट ने उसे आईपीसी की धारा 376(2)(f) के तहत 10 साल के कठोर कारावास और पॉक्सो एक्ट की धारा 4 के तहत भी 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी और दोनों सजाओं को एक के बाद एक लगातार भुगतने का निर्देश दिया था| इसके अलावा उसे आईपीसी की धाराओं 323 और 506 के तहत भी सजा दी गई थी| निचली अदालत के इस आदेश को दोषी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी| उसकी ओर से कोर्ट में उपस्थित अधिवक्ता ने तर्क दिया कि पॉक्सो एक्ट की धारा 42 के मुताबिक अगर कोई आरोपी पॉक्सो और किसी अन्य कानून दोनों के तहत दंडनीय अपराध का दोषी पाया जाता है तो वहां कड़ी या वैकल्पिक सजा का प्रावधान लागू होता है| इस मामले में राज्य सरकार ने भी निष्पक्ष रूप से यह स्वीकार किया कि पॉक्सो एक्ट की धारा 4 और आईपीसी की धारा 376(2)(f) के तहत दी गई सजाओं को लगातार चलाने का आदेश नहीं दिया जा सकता था| घटना के समय पॉक्सो एक्ट की धारा 4 में न्यूनतम 7 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान था जबकि आईपीसी की धारा 376(2)(f) के तहत न्यूनतम 10 वर्ष के कठोर कारावास से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान था| क्योंकि आईपीसी की धारा 376(2)(f) के तहत न्यूनतम सजा अधिक थी इसलिए अदालत ने कानून के प्रावधानों के अनुरूप व्यवस्था दी कि दोनों मामलों में अलग-अलग सजाएं देकर उन्हें जोड़कर लगातार चलाना कानून के तहत सही नहीं है|
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