चतरा : झारखंड हाई कोर्ट ने बिना किसी कानूनी अधिकार के दुकानदार की दूकान तोड़े जाने के मामले में झारखंड सरकार को बड़ा झटका दिया है| अदालत ने मुआवजा देने के आदेश के खिलाफ राज्य सरकार की अपील को खारिज करते हुए कहा कि सरकार की यह अपील न्यायिक प्रक्रिया का दुरूपयोग है, और ऐसा प्रतीत होता है कि अधिकारियों ने खुद पर वित्तीय जिम्मेदारी तय होने और भरपाई अपने जेब से करने के डर से यह याचिका दाखिल की थी|
13 साल चली कानूनी लड़ाई
झारखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एम.एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने 13 वर्षों तक चली रिट कार्यवाही के दौरान भूमि से जुड़े स्वामित्व दस्तावेज पेश न कर पाने पर राज्य सरकार को आड़े हाथों लिया| अदालत ने कहा कि सिंगल बेंच का आदेश आने और अवमानना कार्यवाही शुरू होने के बाद अचानक 1914 के पुराने दस्तावेज पेश करने की कोशिश की गई जो राज्य की नीयत और कार्रवाई को संदिग्ध बनाती है| इसके अलावा पेश किए गए दस्तावेज यह भी स्पष्ट नहीं करते कि वे विवादित जमीन से ही संबंधित हैं या नहीं|
यह मामला हाईकोर्ट की एकल पीठ के 27 जून 2024 के उस आदेश से जुड़ा है जिसमें अदालत ने राज्य अधिकारियों द्वारा मनमाने तरीके से गिराई गई दुकान को दोबारा बनाने के लिए 5 लाख रुपये और मानसिक उत्पीड़न के लिए 25 हजार रुपये (कुल 5.25 लाख रुपये) मुआवजा देने का निर्देश दिया था| सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि पीड़ित दुकानदार ने संबंधित संपत्ति वर्ष 1973 में रजिस्टर्ड सेल डीड के जरिए खरीदी थी और सरकारी राजस्व रिकॉर्ड में भी उसका नाम दर्ज था| इसके बावजूद सरकारी शक्तियों का दुरुपयोग करते हुए बिना किसी वैधानिक अधिकार के उसकी दुकान को ध्वस्त कर दिया गया था|
हाईकोर्ट ने कहा मुआवजा कम है
खंडपीठ ने सिंगल बेंच के उस फैसले को पूरी तरह सही ठहराया जिसमें इस कार्रवाई को राज्य की मनमानी माना गया था| कोर्ट ने टिप्पणी की कि दिया गया मुआवजा वास्तव में कम है फिर भी वह सिंगल बेंच के आदेश में कोई हस्तक्षेप नहीं कर रहा है| अपील खारिज होने के बाद राज्य सरकार ने एक सप्ताह के भीतर 5.25 लाख रुपये की मुआवजा राशि जमा करने का आश्वासन दिया| हाईकोर्ट ने चतरा जिले के DC को यह राशि तय समय सीमा में जमा कराने की व्यक्तिगत जिम्मेदारी सौंपी है जिसके बाद नियमानुसार सत्यापन करके यह राशि पीड़ित दुकानदार को दी जाएगी|
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