नई दिल्ली: राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने आज विज्ञान भवन, नई दिल्ली में अपने 33वें स्थापना दिवस के अवसर पर ‘जल जीवन का अमृत है: जल के अधिकार के माध्यम से मानवीय गरिमा का संवर्धन’ विषय पर एक समारोह एवं राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया| आयोग की स्थापना 12 अक्टूबर, 1993 को हुई थी, समारोह को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि भारत के संविधान में प्रत्येक नागरिक के लिए गरिमा, समानता, स्वतंत्रता और न्याय सहित व्यापक अधिकारों एवं आदर्शों का वचन दिया गया है| प्रस्तावना में उल्लिखित ये शब्द अब तक लिखे गए सर्वोत्तम शब्दों में से हैं और इनका अनुपालन प्रतिदिन जमीनी स्तर पर, पुलिस हवालात में, अस्पताल के वार्ड में तथा सड़क के अंतिम छोर पर स्थित गांव में भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए|
विगत वर्षों के दौरान राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग द्वारा किए गए कार्यों की सराहना करते हुए न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि लोग कभी-कभी यह कहते हैं कि “आयोग केवल सिफारिश कर सकता है, आदेश नहीं दे सकता|” लेकिन मैं इस बात को दूसरे तरीके से समझाना चाहूंगा| कल्पना कीजिए कि समाज में अन्याय की लहरें उठ रही हैं और उनके बीच एक प्रकाश स्तंभ मजबूती से खड़ा है| उसका काम अन्याय की लहरों को रोकना नहीं, बल्कि अंधकार में भटक रहे लोगों को प्रकाश दिखाकर सही रास्ते तक पहुंचने में मदद करना है| उन्होंने कहा कि मानव अधिकार आयोगों को शिकायतों की जांचकरनी चाहिए, व्यवस्थागत कमियों की पहचान करनी चाहिए तथा यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जिन मुद्दों की ओर अन्यथा किसी का ध्यान नहीं जाता, उन्हें संस्थागत स्तर पर गंभीरता से लिया जाए| नागरिक समाज जमीनी वास्तविकताओं को सामने लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, जबकि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं वैज्ञानिक ज्ञान, अनुभव और सहयोग के माध्यम से योगदान दे सकती हैं|
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि इसलिए किसी मानव अधिकार संस्था की वास्तविक सफलता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए कि उसने कितने मामलों का निस्तारण किया है, बल्कि इस आधार पर भी किया जाना चाहिए कि क्या उसकी आवाज उन लोगों तक पहुंचती है, जो अपनी बात सबसे कम कह पाते हैं| इस संदर्भ में मानव अधिकार आयोगों, विशेषकर राज्य मानव अधिकार आयोगों की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाती है| भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में अधिकारों का वास्तविक अनुभव प्रायः राजधानी में नहीं, बल्कि किसी दूरस्थ गांव, किसी विशेष मोहल्ले या यहां तक कि किसी घर में निर्धारित होता है| राष्ट्रीय आयोग मानक निर्धारित कर सकता है और व्यापक स्तर पर सामने आने वाले रुझानों एवं समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित कर सकता है, लेकिन राज्य आयोग प्रायः उन स्थानों के अधिक निकट होते हैं, जहां मानव अधिकारों का उल्लंघन होता है| वे शिकायतकर्ता की भाषा में उसकी शिकायत सुन सकते हैं, घटनास्थल तक पहुंच सकते हैं और उन स्थानीय परिस्थितियों को समझ सकते हैं, जिनमें उल्लंघन हुआ है| यह निकटता उन्हें केवल प्रशासनिक लाभ ही नहीं देती, बल्कि एक ऐसी जिम्मेदारी भी सौंपती है, जो लोगों के जीवन में निर्णायक परिवर्तन ला सकती है|
उन्होंने स्थापना दिवस समारोह के साथ ‘जल जीवन का अमृत है’ विषय पर राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करने के लिए भी आयोग की सराहना की| उन्होंने कहा कि जल के अधिकार को केवल वर्तमान पीढ़ी के अधिकार के रूप में ही नहीं, बल्कि भविष्य के प्रति उत्तरदायित्व के रूप में भी समझा जाना चाहिए|
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि भारत ने पेयजल तक लोगों की पहुंच बढ़ाने के लिए व्यापक स्तर पर असाधारण प्रयास किए हैं| इनमें ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्येक घर तक नल के माध्यम से जलापूर्ति सुनिश्चित करने के प्रयास भी शामिल हैं| इस प्रगति की सराहना की जानी चाहिए, किंतु अब अगला प्रश्न और अधिक महत्त्वपूर्ण है—क्या जल सुरक्षित है, क्या इसकी आपूर्ति विश्वसनीय है और क्या परिवार को आवश्यकता के समय यह उपलब्ध होता है? इसलिए, “सरकार को उन प्रणालियों का निर्माण और रखरखाव करना चाहिए, जिनके माध्यम से लोगों तक जल पहूंचता है| जब संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो न्यायालयों को हस्तक्षेप करना चाहिए|”
उन्होंने राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, भारत के मोबाइल एप्लिकेशन की शुरुआत और अपने रिकार्ड के डिजिटलीकरण की दिशा में उठाए गए कदमों के लिए भी आयोग की सराहना की| उन्होंने कहा कि यह ऐप उन लोगों के लिए आयोग तक पहुंच को अधिक सुगम बनाता है, जिन्हें परंपरागत रूप से औपचारिक संस्थानों तक पहुंचने में कठिनाई होती रही है|
इससे पहले, स्थापना दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रण स्वीकार करने के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश का धन्यवाद करते हुए, राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति श्री वी. रामासुब्रमण्यम ने कहा, “देश में मुख्य न्यायाधीश का पद आज एक ऐसा पद बन गया है, जो सबसे अधिक महत्वपूर्ण, सबसे अधिक शक्तिशाली, सबसे अधिक सक्रिय और साथ ही सबसे अधिक संवेदनशील है। यह पद प्रतिदिन, बल्कि हर मिनट अग्निपरीक्षा से गुजरता है, और ऐसा आवश्यक नहीं है कि हर समय इसकी परीक्षा लेने वाले लोग पवित्र आत्माएँ ही हों।”
अध्यक्ष ने कहा, “इस तथ्य पर कोई असहमति नहीं हो सकती कि आज दुनिया रहने के लिए सौ वर्ष पहले की तुलना में कहीं बेहतर स्थान बन गई है| लेकिन इसके साथ ही, आज हमारे सामने मौजूद चुनौतियां पहले से कहीं अधिक जटिल हैं| इसलिए, समय की आवश्यकता है कि दुनिया भर के मानव अधिकार संस्थान अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए स्वयं को नए सिरे से विकसित करें और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप ढालें|”
न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमण्यम ने कहा कि दुनिया की सबसे गरीब आधी आबादी वैश्विक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के केवल 14 प्रतिशत के लिए जिम्मेदार है| वहीं, दुनिया के सबसे अमीर 10 प्रतिशत लोग कुल उत्सर्जन के आधे हिस्से के लिए जिम्मेदार हैं| यह कोई संयोग नहीं है कि जलवायु और संपत्ति का आपस में इतना गहरा संबंध है, क्योंकि इन दोनों का मूल स्रोत एक ही है—जीवाश्म ईंधन पर आधारित पूंजीवाद| पिछले दो सौ वर्षों में जीवाश्म ईंधन मानवता की असाधारण प्रगति का आधार रहे हैं, लेकिन आज मानवता जिन गंभीर समस्याओं का सामना कर रही है, उनका एक प्रमुख स्रोत भी यही हैं|
उन्होंने कहा कि कुछ दशक पहले तक मानव अधिकार संबंधी मुद्दों के प्रति हमारा दृष्टिकोण सामान्यतः द्विआयामी होता था| हम यह मानकर चलते थे कि यह नागरिक और राज्य के बीच का मामला है, लेकिन अब स्थिति ऐसी नहीं है| डिजिटल क्रांति के बाद गैर-राज्यीय तत्वों की भूमिका भी बहुत बढ़ गई है| आज डिजिटल दुनिया में हमारी राय को प्रभावित किया जा सकता है, हमारी विचार प्रक्रिया को बदला जा सकता है और हमारी शारीरिक तथा मानसिक गतिविधियों पर निगरानी रखी जा सकती है| इसलिए, विशेष रूप से राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के स्थापना दिवस के अवसर पर, यह संकल्प लेने का समय है कि हम नई चुनौतियों का सामना करने के लिए स्वयं को नए सिरे से तैयार करेंगे, मानव अधिकारों के संवर्धन और संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराएंगे तथा अपनी कार्यप्रणाली और कार्यक्षमता को बेहतर बनाने के लिए अपने व्यक्तित्व एवं कार्यशैली में आवश्यक बदलाव लाएंगे, ताकि लोगों तक अपनी सेवाएं अधिक प्रभावी ढंग से पहुंचा सकें|
इससे पहले, राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के सदस्य न्यायमूर्ति (डॉ.) बिद्युत रंजन षडंगि ने कहा कि आयोग कानून और संविधान के अनुरूप सभी व्यक्तियों के मानव अधिकारों को बढ़ावा देने और उनकी रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है| इसमें गरिमा और समानता का अधिकार भी शामिल है|उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के 33 वर्षों के सफर में कुछ उतार-चढ़ाव अवश्य आए होंगे, लेकिन आयोग मानव अधिकारों की रक्षा के अपने दायित्व के प्रति निरंतर प्रतिबद्ध रहा है| आयोग ने अपनी जन सुनवाई और शिविर-आधारित बैठकों के माध्यम से मानव अधिकार उल्लंघन के पीड़ितों के घर-द्वार तक पहुंचकर अपनी पहुंच और कार्यक्षेत्र का विस्तार किया है|
राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की सदस्य श्रीमती विजया भारती सयानी ने कहा कि मानव अधिकारों की अवधारणा प्राचीन भारतीय सभ्यता में गहराई से निहित है, जिसकी झलक देश के संविधान में भी दिखाई देती है| ऋग्वेद और उपनिषदों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत के प्राचीन धर्मग्रंथ हमें परस्पर सम्मान के साथ मिल-जुलकर रहने तथा संवाद और सामूहिक शक्ति के माध्यम से सभी की मानवीय गरिमा और कल्याण की रक्षा करने का मार्ग दिखाते हैं| उन्होंने कहा कि इसलिए हमें अपनी विरासत पर गर्व करना चाहिए और बालिकाओं, बच्चों, महिलाओं तथा अन्य कमजोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए समान भागीदार के रूप में कार्य करना चाहिए|
अपने प्रारंभिक संबोधन में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के महासचिव पीयूष गोयल ने जीवन के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में आयोग द्वारा किए जा रहे विभिन्न कार्यों और उसके विविध आयामों का अवलोकन प्रस्तुत किया| उन्होंने कहा कि समय के साथ मानव अधिकारों से जुड़े विषयों का स्वरूप निरंतर विकसित हो रहा है| जलवायु परिवर्तन और डिजिटल दुनिया नई चुनौतियां उत्पन्न कर रहे हैं| उन्होंने बताया कि आयोग ने अपने 33वें स्थापना दिवस समारोह के अंतर्गत ‘जीवन के अमृत के रूप में जल: जल के अधिकार के माध्यम से मानवीय गरिमा को आगे बढ़ाना’ विषय पर एक राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया है| इस सम्मेलन के अंतर्गत दो तकनीकी सत्र आयोजित किए गए, जिनके विषय निम्नलिखित हैं: ‘जल निकायों का संरक्षण और पुनर्स्थापन: जल के अधिकार के आधार की सुरक्षा|’
राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के पूर्व सदस्यों, महासचिव, राज्य मानव अधिकार आयोगों के अध्यक्षों एवं सदस्यों तथा अन्य आयोगों के प्रतिनिधियों, न्यायपालिका के सदस्यों, राजनयिक समुदाय, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों, विशेष मॉनिटरों एवं विशेष प्रतिवेदकों, वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों, शिक्षाविदों, मानव अधिकार संरक्षकों, शोधकर्ताओं तथा राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों सहित अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने इस समारोह में भाग लिया|
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