नई दिल्ली: राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग द्वारा विदेश मंत्रालय के सहयोग से आयोजित वैश्विक दक्षिण के राष्ट्रीय मानव अधिकार संस्थानों के लिए मानव अधिकारों पर छह दिवसीय भारतीय तकनीकी एवं आर्थिक सहयोग कार्यकारी क्षमता निर्माण कार्यक्रम का नई दिल्ली में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ| समापन सत्र को राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमण्यन ने संबोधित किया| इस अवसर पर संयुक्त सचिव समीर कुमार, सुश्री सैडिंगपुई छकछुआक तथा अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे|
14 सितम्बर,2026 को प्रारम्भ हुए इस कार्यक्रम में अल्जीरिया,चिली, इक्वाडोर,इथियोपिया, इंडोनेशिया,कजाकिस्तान, केन्या,किर्गिस्तान,मलेशिया,ओमान,समोआ,दक्षिण अफ्रीका,ताजिकिस्तान और जिम्बाब्वे के 14 राष्ट्रीय मानव अधिकार संस्थानों के 38 वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया| कार्यक्रम में प्रतिष्ठित व्यक्तियों और विषय-विशेषज्ञों के साथ संवादात्मक सत्र आयोजित किए गए, जिनमें प्रतिभागियों को नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकारों के विभिन्न आयामों से परिचित कराया गया|
कार्यक्रम के वक्ताओं में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमण्यन, महासचिव पीयूष गोयल, महानिदेशक (जांच) सुश्री अनुपमा निलेकर चंद्रा, भारत में संयुक्त राष्ट्र आवासीय समन्वयक स्टेफन प्रीस्नर, राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के संयुक्त सचिव समीर कुमार, भारत सरकार की पूर्व सचिव सुश्री भामति बालासुब्रमण्यम, भारतीय कारागार सुधारक एवं टिंका टिंका फाउंडेशन की संस्थापक प्रो. (डॉ.) वर्तिका नंदा, एम्स के मनोरोग विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) प्रताप शरण, डॉ. पूर्वा मित्तल, राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की विशेष मॉनिटर तथा बेगर कॉरपोरेशन के संस्थापक चंद्र मिश्रा शामिल थे| कार्यक्रम को विभिन्न राष्ट्रीय मानव अधिकार संस्थानों के अधिकारियों द्वारा साझा किए गए अनुभवों ने भी समृद्ध बनाया|
अपने समापन संबोधन में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमण्यन ने कार्यक्रम के दौरान सभी प्रतिभागियों द्वारा प्रदर्शित सौहार्द, सहयोग और सकारात्मक ऊर्जा के लिए उनके प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया| उन्होंने कहा कि यह क्षमता निर्माण कार्यक्रम केवल अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार साधनों की व्याख्या तक सीमित नहीं है, क्योंकि उनका व्यावहारिक अनुप्रयोग विभिन्न देशों की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार भिन्न होता है| विज्ञान से एक उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय मानव अधिकार संस्थान मानव अधिकारों की “प्रयोगशाला” में कार्य करते हैं, जहां अनुभवों का आदान-प्रदान, चुनौतियों का समाधान और गलतियों से सीखना संस्थागत अधिगम तथा सुधार को बढ़ावा देता है|
न्यायमूर्ति रामासुब्रमण्यन ने प्रतिनिधियों की सक्रिय भागीदारी की सराहना करते हुए कहा कि मानव गरिमा, शांति और पारस्परिक सम्मान को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय मानव अधिकार संस्थानों के बीच मित्रता, सहयोग और आपसी समझ अत्यंत महत्वपूर्ण है| उन्होंने वैश्विक दक्षिण के राष्ट्रीय मानव अधिकार संस्थानों के बीच अधिक सुदृढ़ सहयोग तथा सहयोग के लिए एक साझा मंच को औपचारिक रूप देने की आवश्यकता पर भी बल दिया|
प्रतिभागियों ने इस कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग और विदेश मंत्रालय की सराहना की| उन्होंने मानव अधिकारों, सुशासन तथा विविध सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और भाषायी पहचानों वाले लोकतांत्रिक भारत में मानव अधिकारों के सम्मान की भारतीय परंपरा के विभिन्न पहलुओं को जानने का अवसर मिलने पर प्रसन्नता व्यक्त की|प्रतिभागियों को भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करने के लिए राष्ट्रपति भवन, लाल किला और ताजमहल जैसे प्रतिष्ठित स्थलों का भ्रमण करने का अवसर भी मिला|
राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के संयुक्त सचिव समीर कुमार ने प्रशिक्षण कार्यक्रम का अवलोकन प्रस्तुत करते हुए बताया कि अब तक 46 देशों के प्रतिभागी तथा विभिन्न राष्ट्रीय मानव अधिकार संस्थानों के लगभग 200 प्रतिनिधि इस पहल का हिस्सा बन चुके हैं| उन्होंने मानव अधिकारों की सार्वभौमिकता को बनाए रखते हुए एक संतुलित एवं संदर्भ-संवेदी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया तथा कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों द्वारा किए गए सक्रिय संवाद और ज्ञान एवं अनुभवों के मूल्यवान आदान-प्रदान की प्रशंसा की|
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