Home झारखंडबिना चार्जशीट तीन महीने से अधिक निलंबन गलत: झारखंड हाई कोर्ट

बिना चार्जशीट तीन महीने से अधिक निलंबन गलत: झारखंड हाई कोर्ट

by Munna Pathak

रांची: झारखंड हाई कोर्ट ने एक मामले में फैसला सुनाते हुए दोहराया है कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी को तीन महीने भीतर आरोप पत्र (चार्जशीट) नहीं सौपन जाता है तो उसका निलंबन सामान्यतः तीन महीने से अधिक जारी नहीं रखा जा सकता है| अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि विभागीय कार्यवाही शुरू किए बिना लंबे समय तक निलंबन को एक प्रकार की सजा के रूप में जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती| हाई-कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की पीठ ने यह निर्णय केंद्र सरकार द्वारा दायर उस याचिका को खारिज करते हुए दिया जिसमें केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) के आदेश को चुनौती दी गई थी| कैट ने डाक विभाग के एक कर्मचारी के लंबे निलंबन को रद्द कर दिया था|

जाने ​क्या है मामला?
यह मामला गिरिडीह प्रधान डाकघर में कोषाध्यक्ष के रूप में कार्यरत एक कर्मचारी से जुड़ा है| जिन्हें झारखंड डाक परिमंडल में हुए 26 करोड़ रुपये से अधिक के कथित घोटाले के सिलसिले में 27 सितंबर 2019 को निलंबित कर दिया गया था| हालांकि उनके निलंबन की समय-समय पर समीक्षा की गई, लेकिन विभागीय चार्जशीट निलंबन के लगभग ढाई साल बाद सात मार्च 2022 को जारी की गई| प्रशासन ने इस देरी का बचाव करते हुए तर्क दिया कि मामला गंभीर है और सीबीआई की जांच लंबित होने के कारण निलंबन बढ़ाया गया था| इस मामले की सुनवाई के दौरान हाई-कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि निलंबन का उद्देश्य कर्मचारी को जांच में बाधा डालने से रोकना है न कि उसे सजा देना|

कोर्ट ने कहा कि अगर तीन महीने के भीतर चार्जशीट नहीं दी जाती है तो निलंबन आदेश आगे नहीं बढ़ाया जा सकता| समीक्षा के जरिए इसे तभी बढ़ाया जा सकता है जब चार्जशीट सौंपी जा चुकी हो| खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि केवल सीबीआई जांच लंबित होना इतने लंबे निलंबन का औचित्य नहीं हो सकता| अधिकारी चाहें तो पहले भी विभागीय कार्यवाही शुरू कर सकते थे या कर्मचारी को काम पर वापस बुला सकते थे| कैट ने निलंबन रद्द करते हुए पहले तीन महीनों के बाद के वेतन की पात्रता पर विचार करने का निर्देश दिया था| हाई-कोर्ट ने कैट के इस फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि लंबे समय तक निलंबित रहने से कर्मचारी को मानसिक और आर्थिक नुकसान होता है जबकि जीवन निर्वाह भत्ता केवल जीवन यापन के लिए होता है|

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