रांची: झारखंड उच्च न्यायालय ने भूमि अधिग्रहण और संपत्ति के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है| अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट तौर पर कहा है कि अगर किसी सार्वजनिक परियोजना के लिए किसी व्यक्ति का मकान अधिग्रहित किया जाता है तो केवल इस आधार पर मुआवजे से सरकार इनकार नहीं कर सकती कि जमीन का मालिकाना हक़ या उस जमीन की वैधता को लेकर कोई विवाद है| यह आदेश झारखंड उच्च न्यायालय के विद्वान न्यायाधीश न्यायमूर्ति आनंद सेन की एकल पीठ ने याचिकाकर्ता सच्चिदानंद चौधरी की रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया|
पुनासी बांध परियोजना से जुड़ा है मामला
यह मामला देवघर जिले की पुनासी बांध परियोजना से जुड़ा है| सच्चिदानंद चौधरी की जमीन और मकान को 1986 में पुनासी बांध परियोजना के लिए अधिग्रहित किया गया था| उन्होंने अदालत को बताया कि बार-बार गुहार लगाने और सरकारी जांच रिपोर्टों में उनके दावे की पुष्टि होने के बावजूद भी उन्हें आज तक मुआवजा नहीं दिया गया| राज्य सरकार ने देवघर DC के 12 जनवरी 2021 के उस आदेश का हवाला दिय जिसमें याचिकाकर्ता के दावे को खारिज कर दिया गया था| सरकार का कहना था कि यह जमीन गैरमजरुआ है और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (SPT Act) के तहत याचिकाकर्ता के नाम पर इसका वैध बंदोबस्त साबित नहीं हुआ है| सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि सरकारी अधिकारियों ने खुद स्वीकार किया है कि उसी गैरमजरुआ जमीन पर बने अन्य लोगों जैसे सुभद्रा देवी और नानकू चौधरी के वारिसों के मकानों के लिए पहले ही मुआवजा दिया जा चुका है|सरकारी दस्तावेजों और जांच रिपोर्टों से यह पूरी तरह साबित होता है कि याचिकाकर्ता लंबे समय से उस जमीन पर काबिज थे और वहां उनका आवासीय ढांचा मौजूद था| अगर जमीन के वैध बंदोबस्त या मालिकाना हक के विवाद के कारण याचिकाकर्ता को जमीन का मुआवजा नहीं भी मिलता है तब भी उस जमीन पर बने मकान और अन्य ढांचों के मुआवजे से उन्हें वंचित नहीं किया जा सकता| सभी पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने देवघर जिला प्रशासन को निर्देश दिया है कि इस आदेश की प्रति मिलने के 16 सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता के आवासीय ढांचे के मूल्य का सही आकलन किया जाए और उन्हें मुआवजे की राशि का भुगतान किया जाए|
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