Home इधर-उधरग्रामीणों को गोबर के बदले मिल रहा एलपीजी गैस

ग्रामीणों को गोबर के बदले मिल रहा एलपीजी गैस

by Munna Pathak

मधुबनी : जिले के झंझारपुर प्रखंड अंतर्गत स्थित सुखेत ग्राम पंचायत ने ग्रामीण विकास, स्वछता और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में एक नया इतिहास रचा है|इस गांव का सुखेत मॉडल आज केवल स्थानीय स्तर पर ही नहीं बल्कि पुरे देश के लिए एक प्रेरणास्रोत बनकर उभरा है|इसकी प्रशंसा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने लोकप्रिय कार्यक्रम “मन की बात” में की है|इस अनूठी पहल की शुरुआत मछडी गांव के एक दूरदर्शी और प्रगतिशील किसान सुनील कुमार ने की है|मूल रूप से पशुपालन पर आधारित सुखेत पंचायत में अक्सर गलियों और खुले स्थानों पर गोबर बिखरा रहता था, जिससे न केवल गंदगी फैलती थी, बल्कि दुर्गंध से बीमारियां भी पनपती थीं| इस समस्या का स्थायी समाधान तलाशने के लिए गांव के किसान सुनील कुमार ने एक अभिनव मॉडल की रूपरेखा तैयार की| इस योजना के तहत गांव के लगभग 50 से 60 परिवारों को आपस में जोड़ा गया| प्रतिदिन दो बार ठेलों के माध्यम से इन घरों से 20 से 30 किलोग्राम गोबर और रसोई का कचरा एकत्रित किया जाने लगा| इससे गांव में जहां-तहां बिखरे कचरे की समस्या समाप्त हुई और साफ-सफाई का स्तर काफी ऊंचा हो गया|पंचायत में एकत्रित किए गए गोबर और जैविक कचरे के बेहतर प्रसंस्करण के लिए किसान सुनील ने 70 फीट लंबे और 20 फीट चौड़े दो विशाल शेड तैयार किए, इसमें वर्मी कंपोस्टिंग यूनिट बनाई गईं| इस केंद्र में लगभग 100 क्विंटल गोबर और कचरे का प्रतिमाह प्रसंस्करण किया जाता है,जिससे हर महीने लगभग 35 से 40 क्विंटल उच्च गुणवत्ता वाली वर्मी कंपोस्ट (केचुआ खाद) तैयार की जाने लगी|इस पूरी प्रक्रिया में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा (समस्तीपुर) का महत्वपूर्ण तकनीकी सहयोग दिया गया| विश्वविद्यालय ने पहले सुनील की भूमि पर पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी और आज वह तैयार इस जैविक खाद का खुद प्रमुख खरीददार बन चुकी है|किसान सुनील बताते हैं कि सुखेत मॉडल की सबसे आकर्षक और क्रांतिकारी विशेषता इसका एलपीजी कूपन सिस्टम है| इस योजना के अंतर्गत जो किसान या ग्रामीण इस संयंत्र में 1200 किलोग्राम गोबर देते हैं, उन्हें एक एलपीजी गैस सिलेंडर रिफिल करने का कूपन दिया जाता है| यदि कोई परिवार प्रतिदिन औसतन 20 किलो गोबर देता है, तो उसे हर दो महीने में एक सिलेंडर बिल्कुल मुफ्त रिफिल कराने की सुविधा मिल जाती है|इससे ग्रामीण परिवारों को रसोई गैस के भारी खर्च से आर्थिक राहत मिली है और स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा मिला है| उन्होंने बताया कि इस पहल से उन्हें खुद वार्षिक आमदनी 3 लाख रूपये होने के साथ ही 6 स्थानीय युवाओं को रोजगार भी दे रहे हैं|

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