उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत पीड़ित बच्चों को केवल इसलिए वित्तीय सहायता (मुआवजे) से वंचित नहीं किया जा सकता, कि उनके पास शारीरिक चोट की मेडिकल रिपोर्ट मौजूद नहीं है| अदालत ने इसे पीड़ितों के हक में एक बड़ा कदम मानते हुए उत्तर प्रदेश सरकार की इस शर्त को असंवैधानिक घोषित कर दिया है|
हाईकोर्ट का अहम फैसला:
न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की पीठ ने सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश रानी लक्ष्मी बाई महिला एवं बाल सम्मान कोष नियमावली, 2015 के तहत वित्तीय सहायता प्राप्त करने के लिए मेडिकल और इंजरी रिपोर्ट अनिवार्य नहीं है| कोर्ट ने कहा यदि मेडिकल या इंजरी रिपोर्ट उपलब्ध है, तो उसे संबंधित प्राधिकरण के समक्ष रखा जा सकता है और उस पर विचार किया जा सकता है, लेकिन इसकी अनुपस्थिति वित्तीय सहायता के रास्ते में पूर्ण रुकावट नहीं बन सकती| इसी आधार पर अदालत ने उस शर्त को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया, जिसके तहत गंभीर यौन हमले के मामलों में मेडिकल जांच रिपोर्ट देना अनिवार्य बनाया गया था|
क्या था मामला?:
यह याचिका 8 साल की एक नाबालिग बच्ची की मां द्वारा दायर की गई थी| वर्ष 2024 में बच्ची के साथ कथित तौर पर यौन उत्पीड़न हुआ था| FIR दर्ज कराते समय बच्ची ने शारीरिक चोटों से जुड़ी मेडिकल जांच कराने से इंकार कर दिया था| पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया और मामले में चार्जशीट दाखिल कर दी| जब पीड़ित परिवार ने सरकारी योजना के तहत वित्तीय सहायता के लिए आवेदन किया, तो राज्य सरकार ने मेडिकल रिपोर्ट न होने का हवाला देकर आवेदन खारिज कर दिया, इसके बाद पीड़िता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया|
हाईकोर्ट की मुख्य बातें और तर्क:
हाईकोर्ट ने स्वीकार किया कि राज्य सरकार के पास फर्जी दावों को रोकने और सरकारी पैसे की सुरक्षा के लिए नियम बनाने का अधिकार है| हालांकि, कोर्ट ने कहा कि नियमों और प्रक्रियाओं का उद्देश्य पात्र पीड़ितों की मदद करना है, उन्हें सहायता पाने से रोकना नहीं| अदालत ने पॉक्सो अधिनियम की धारा तीन का उल्लेख करते हुए कहा कि यौन हमला केवल वही नहीं है, जिसमें शरीर पर दिखाई देने वाली कोई चोट लगे| इसमें किसी वस्तु या अंग का प्रवेश, अवांछित स्पर्श या मौखिक हरकतें भी शामिल हैं| इसलिए, किसी मामले में शारीरिक चोट न दिखने का मतलब यह नहीं है कि अपराध नहीं हुआ है|
ट्रायल और अंतिम फैसले पर असर:
कोर्ट ने टिप्पणी की कि जब मुख्य आपराधिक मुकदमे में भी केवल मेडिकल रिपोर्ट न होने के कारण आरोपी को बरी नहीं किया जा सकता, तो फिर एक सामाजिक कल्याण योजना के तहत दी जाने वाली शुरुआती वित्तीय सहायता के लिए मेडिकल रिपोर्ट को अनिवार्य बनाना बिल्कुल तर्कहीन और विसंगतिपूर्ण है| अदालत ने स्पष्ट किया कि FIR चार्जशीट या मेडिकल रिपोर्ट में से कोई भी दस्तावेज अकेले अपराध सिद्ध नहीं करता, बल्कि अदालत पूरे सबूतों के आधार पर निर्णय लेती है| FIR और जांच के बाद दाखिल चार्जशीट ही वित्तीय सहायता की पात्रता के लिए पर्याप्त आधार बनते हैं| इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले से यौन उत्पीड़न का शिकार हुई उन अनगिनत बाल पीड़ितों को बड़ी राहत मिलेगी, जो मानसिक आघात, झिझक या अन्य कारणों से घटना के समय तुरंत मेडिकल जांच नहीं करा पाती हैं या जिनके मामलों में शारीरिक चोट के निशान नहीं उभरते हैं| अब राज्य सरकार केवल मेडिकल रिपोर्ट न होने का बहाना बनाकर पीड़ितों को आर्थिक सहायता देने से मना नहीं कर सकेगी|
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