नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में दोहराया है कि किसी भी आपराधिक मामले में आरोपी व्यक्ति को लंबे समय तक प्री-ट्रायल हिरासत में रखना बिना मुकदमे के दी जाने वाली सजा नहीं बन सकटी| अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी आरोपी को लंबे समय तक जेल में रखा जाता है, तो यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए उसके व्यक्तिगत स्वतंत्रता और त्वरित सुनवाई के मौलिक अधिकार का सीधा उल्लंघन है| न्यायमूर्ति दीपंकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने यह टिप्पणी राजस्थान के बहुचर्चित जल जीवन मिशन भ्रष्टाचार मामले से जुड़ी जमानत याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान कही|
क्या है मामला?:
यह मामला राजस्थान के जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (पीएचईडी) द्वारा जारी किए गए टेंडरों में कथित वित्तीय अनियमितताओं से जुड़ा हुआ है| श्री गणपति ट्यूबवेल कंपनी’ और ‘श्री श्याम ट्यूबवेल कंपनी’ नामक दो फर्मों ने इरकॉन इंटरनेशनल लिमिटेड द्वारा जारी फर्जी कार्य-पूर्णता प्रमाण पत्रों का उपयोग कर 2021 से 2023 के बीच लगभग 979.45 करोड़ मूल्य के 104 वर्क ऑर्डर हासिल किए| भ्रष्टाचार निवारण ब्यूरो (एसीबी) की जांच के बाद 30 अक्टूबर 2024 को प्राथमिकी दर्ज की गई, जिसके बाद महेश चंद्र जोशी और मुकेश पाठक को गिरफ्तार किया गया| राजस्थान उच्च न्यायालय ने 13 अगस्त 2026 को दोनों आरोपियों की नियमित जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं, जिसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया|
सुप्रीम कोर्ट की जमानत देने के कारण:
शीर्ष अदालत ने स्वीकार किया कि करोड़ों रुपये के सार्वजनिक कल्याणकारी प्रोजेक्ट में वित्तीय अनियमितताओं और मिलीभगत के आरोप बेहद गंभीर हैं| लेकिन पीठ ने स्पष्ट किया कि आरोपों की गंभीरता,चाहे वह कितनी भी अधिक क्यों न हो, अकेले जमानत के अन्य पहलुओं को धुंधला नहीं कर सकती और न ही अनिश्चितकालीन हिरासत का औचित्य साबित कर सकती है|अदालत ने महेश चंद्र जोशी और मुकेश पाठक को जमानत देते हुए निम्नलिखित बिंदुओं को मुख्य आधार माना|दोनों आरोपियों के खिलाफ जांच पूरी हो चुकी है और आरोप पत्र दाखिल किए जा चुके हैं|मामले से जुड़े मुख्य दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य पुलिस द्वारा पहले ही जब्त किए जा चुके हैं,जिससे अब हिरासत में रखकर पूछताछ की आवश्यकता नहीं है|
कोर्ट ने आरोपियों को दी राहत:
आरोपी महेश चंद्र जोशी (आयु लगभग 72 वर्ष) 5 महीने से अधिक और मुकेश पाठक लगभग 8 महीने से हिरासत में थे| इस मामले में कुल 22 आरोपी हैं, 3 चार्जशीट दाखिल हो चुकी हैं, 124 अभियोजन गवाह हैं और 20,000 से अधिक पन्नों वाले 192 दस्तावेज शामिल हैं| अभी तक कोर्ट द्वारा आरोप भी तय नहीं किए गए हैं, जिससे मुकदमा समाप्त होने में लंबा समय लगने की संभावना है| मामले के कई अन्य सह-आरोपियों को पहले ही जमानत या अंतरिम राहत मिल चुकी है| इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और दोनों याचिकाकर्ताओं को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया|
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