Home न्यायालयबेकसूरों और बच्चों के नाम पुलिस की हिस्ट्रीशीट में नहीं होंगे दर्ज : सुप्रीम कोर्ट

बेकसूरों और बच्चों के नाम पुलिस की हिस्ट्रीशीट में नहीं होंगे दर्ज : सुप्रीम कोर्ट

by Munna Pathak

झारखंड: रांची पुलिस द्वारा तैयार की जाने वाली ‘हिस्ट्रीशीट’ और निगरानी सूची में मनमाने तरीके से नाम दर्ज किए जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रूख अपनाया है| सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि किसी व्यक्ति के निर्दोष रिश्तेदारों, नाबालिग बच्चों या उनकी सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक पृष्ठभूमि के आधार पर उन्हें हिस्ट्रीशीट में शामिल नहीं किया जा सकता| अदालत ने नागरिकों की गरिमा और निजता की रक्षा पर जोर देते हुए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अपनी मौजूदा नीतियों की समीक्षा कर जरूरी सुधार करने के निर्देश दिए हैं|

क्या था पूरा मामला:?
यह मामला दिल्ली के जामिया नगर थाने में अमानतुल्लाह खान के खिलाफ खोली गई हिस्ट्रीशीट और उन्हें ‘बैड कैरेक्टर’ घोषित करने के प्रस्ताव से जुड़ा था| दिल्ली हाईकोर्ट ने 19 जनवरी 2023 को उनकी याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा| सुनवाई के दौरान सामने आया कि पुलिस रिकॉर्ड में अमानतुल्लाह खान के स्कूल जाने वाले नाबालिग बच्चों का विवरण भी दर्ज था, जबकि उनके खिलाफ कोई प्रतिकूल सामग्री नहीं थी| सुप्रीम कोर्ट ने इस पर गंभीर चिंता जताई और निर्दोष परिजनों की गरिमा, आत्म-सम्मान और निजता की रक्षा पर जोर दिया|

हिस्ट्रीशीट में किन लोगों का नाम दर्ज किया जा सकता है:?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘रिलेशंस एंड कनेक्शंस’ वाले हिस्से में ऐसे लोगों का ही विवरण दर्ज किया जाना चाहिए, जिनका आरोपी की मदद करने से सीधा संबंध हो| नाबालिग बच्चों और अन्य निर्दोष रिश्तेदारों का नाम केवल इस आधार पर दर्ज नहीं किया जा सकता कि वे आरोपी के परिवार का हिस्सा हैं| कोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि किसी नाबालिग रिश्तेदार का नाम तभी दर्ज किया जाना चाहिए, जब उसके द्वारा आरोपी को पुलिस से बचने के दौरान शरण देने से संबंधित साक्ष्य मौजूद हों|

हिस्ट्रीशीट रहेगी गोपनीय:
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिस्ट्रीशीट पुलिस का आंतरिक और गोपनीय दस्तावेज है और इसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता| अदालत ने हिस्ट्रीशीट में दर्ज संवेदनशील जानकारियों की गोपनीयता बनाए रखने पर भी जोर दिया है| कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को हिस्ट्रीशीट की समय-समय पर समीक्षा और ऑडिट के लिए संयुक्त पुलिस आयुक्त या उससे ऊपर के स्तर के अधिकारी को जिम्मेदारी देने का निर्देश दिया| जांच में किसी व्यक्ति के निर्दोष पाए जाने पर उसके नाम को हटाने की प्रक्रिया सुनिश्चित करने को भी कहा गया|

जाति और सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर कार्रवाई नहीं:
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति के सामाजिक, आर्थिक या शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग से होने, या उसके अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति अथवा अन्य समुदाय से संबंध रखने के आधार पर हिस्ट्रीशीट में उसका नाम दर्ज नहीं किया जा सकता| अदालत ने राज्यों को ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करने को कहा है, जिससे निर्दोष लोगों को पूर्वाग्रह या भेदभाव के आधार पर पुलिस निगरानी का सामना न करना पड़े| साथ ही, हिस्ट्रीशीट की समय-समय पर समीक्षा के लिए वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की निगरानी को महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय माना गया है|

अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा और निजता की सुरक्षा:
सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की व्यापक व्याख्या करते हुए गरिमा और सम्मान के साथ जीवन जीने के अधिकार पर जोर दिया| अदालत ने माना कि पुलिस की निगरानी व्यवस्था ऐसी नहीं होनी चाहिए, जिससे निर्दोष लोगों की प्रतिष्ठा, निजता और गरिमा प्रभावित हो|

झारखंड पुलिस समेत सभी राज्यों को नीति की समीक्षा करनी होगी:
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस की ओर से पेश किए गए संशोधित स्टैंडिंग ऑर्डर को ध्यान में रखते हुए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अपनी नीतियों की समीक्षा करने और आवश्यक सुधार करने के निर्देश दिए हैं| अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि फैसले की प्रति सभी राज्यों के मुख्य सचिवों और पुलिस प्रमुखों तक पहुंचाई जाए| ऐसे में झारखंड पुलिस को भी अपनी हिस्ट्रीशीट और निगरानी से संबंधित मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा कर यह सुनिश्चित करना होगा कि निर्दोष रिश्तेदारों, नाबालिग बच्चों या किसी व्यक्ति की सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर उनके साथ भेद-भावपूर्ण व्यवहार न हो|

Have any thoughts?

Share your reaction or leave a quick response — we’d love to hear what you think!

You may also like

Leave a Comment