रांची : झारखंड हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि एक पिता जो अपने नाबालिग संतान का स्वाभाविक संरक्षक होता है उस पर अपनी पत्नी की कस्टडी से बच्चे को ले जाने के लिए अपहरण का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है| झारखंड हाई कोर्ट के विद्वान न्यायाधीश अनिल कुमार चौधरी की एकल पीठ ने धनबाद के एक व्यक्ति के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही और ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के संज्ञान आदेश को निरस्त करते हुए यह फैसला दिया|
क्या था मामला
याचिकाकर्ता पर अपने चार वर्षीय बेटे को धनबाद रेलवे स्टेशन से ले जाने, पत्नी से मारपीट करने और गलत तरीके से रोकने के आरोप में मामला दर्ज किया गया था,जिसके खिलाफ पिता ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी| पिता के याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि अपहरण का अपराध सिद्ध करने के लिए नाबालिग को उसके कानूनी अभिभावक की कस्टडी से बिना सहमति के ले जाना आवश्यक है| चूंकि आरोपी पिता खुद बच्चे का स्वाभाविक संरक्षक है इसलिए यहां किडनैपिंग के जरूरी तत्व पूरे नहीं होते|झारखंड हाई कोर्ट ने माना कि यदि शिकायत के सभी आरोपों को सत्य भी मान लिया जाए तब भी कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता, ऐसी स्थिति में मुकदमे की कार्यवाही को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग होगा| कोर्ट ने इसी आधार पर निचली अदालत का आदेश रद्द कर याचिकाकर्ता को राहत देते हुए धनबाद में दर्ज मामले को और निचली अदालत के आदेश को पूर्णरूपेण ख़ारिज क्र दिया|
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