पटना: राज्य में प्लास्टिक के बढ़ते प्रदूषण और खानपान में माइक्रोप्लास्टिक के खतरों से मुक्ति के लिए मुझफ्फरपुर के कुढ़नी प्रखंड के इंजिनियर ने एल अनोखा विकल्प पेश किया है| प्रखंड के छितरौली पंचायत अंतर्गत मुरादपुर निवासी इंजीनियर नाज ओजैर ने मक्के के बेकार समझे जाने वाले छिलके से चाय के कप, प्लेट, कटोरी, ग्लास, स्ट्रॉ और झोला जैसे पर्यावरण-अनुकूल उत्पाद तैयार कर सिंगल यूज प्लास्टिक का मजबूत विकल्प खोज निकाला है|उनके वर्षों की कड़ी मेहनत से मिले इस नवाचार को केंद्र सरकार से पेटेंट भी हासिल हो चुका है| इसके बल पर उन्होंने एमएनओ स्वदेशी इंडिया प्रा.लि.नाम से अपना स्टार्टअप शुरू किया है| उनकी यह पहल न केवल पर्यावरण संरक्षण में मददगार साबित हो रही है, बल्कि स्थानीय किसानों की आय बढ़ाने और युवाओं को रोजगार देने का जरिया भी बन गई है| इंजीनियर नाज बताते हैं कि सफलता का सफर आसान नहीं था| प्लास्टिक बर्तनों के स्वास्थ्य पर पड़ रहे दुष्प्रभावों को देखते हुए उन्होंने करीब पांच वर्षों तक बांस, केला और पपीते के रेशों पर शोध किया| इसके बाद उन्होंने मक्के के छिलके पर काम शुरू किया और उसे एक निश्चित तापमान पर गर्म करके ढालने की तकनीक खोजी|
अपने इस प्रयोग में उन्होंने पाया कि एक बार आकार में ढल जाने के बाद मक्के के छिलके के बर्तन अपना आकार नहीं बदलते| इस तकनीक के लिए उन्होंने 1 मार्च 2019 को पेटेंट का आवेदन किया था, जिसके बाद 21 फरवरी 2024 को उन्हें आधिकारिक पेटेंट प्रमाण पत्र हासिल हुआ| पेटेंट मिलने के बाद 26 मई 2026 को उन्होंने अपने स्टार्टअप की स्थापना की और उत्पादन शुरू किया| ग्रामीण विकास विभाग के अधिकारियों का कहना है कि राज्य में स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण), लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाले नवाचार को प्रोत्साहित किया जा रहा है| मिशन के माध्यम से मक्के के बेकार समझे जाने वाले जैविक छिलकों से पर्यावरण-अनुकूल उत्पाद तैयार करने की तकनीक और इसकी प्रक्रिया को लोगों तक पहुंचाया जा रहा है| इंजीनियर नाज के सहयोग से स्थानीय लोगों को भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि कृषि अपशिष्ट का उपयोगी उत्पादों में रूपांतरण हो सके|
100 उत्पादों को पर्यावरण अनुकूल उत्पादों में रिप्लेस करने का लक्ष्यः
इंजीनियर नाज का कहना है आगामी 10 वर्षों में सिंगल यूज प्लास्टिक से बने कम से कम 100 उत्पादों को पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों में रिप्लेस करने की उनकी योजना है| कप, प्लेट सहित अन्य उत्पाद बनाने के लिए किसानों से मक्के का छिलका करीब 1 से 2 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से खरीदते हैं| एक उत्पाद को बनाने में 45 से 50 पैसे की लागत आती है और कटोरी जैसे उत्पाद को करीब 2 रुपये प्रति पीस की दर से बेचा जाता है| इंजीनियर नाज ने बताया कि मौजूदा समय में इस कारोबार से उनकी सालाना करीब 5 लाख रुपये की विशुद्ध आमदनी हो रही है| इनकी छोटी सी फैक्ट्री में आठ स्थानीय लोगों को रोजगार भी उपलब्ध कराया गया है|
Have any thoughts?
Share your reaction or leave a quick response — we’d love to hear what you think!